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शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

सामाजिक रिशतें

मन में फिर फूल खिलने लगे है,
आशाओं के दीप फिर जलने लगें है ।
आसमान में पहले दिखती थी कालीमा,
अब रूपहले इन्‍द्र धनुष से बनने लगें है ।।


मुस्‍कान से भी पहले जो करते थे नफरत,
दिल खोलकर हँसने लगें है ।
कटे-कटे से रहना जिनकी थी आदत,
अब दौडकर गले मिलने लगें है ।।


सम्‍मेलन हमारे लिए लाया है ढेरों सौगातें,
स्‍वागत में पाँवडे बिछने लगें है ।
मजबुरी से लगते थे पहले सामाजिक रिशतें,
अब सुनहरे ख्‍वाब से लगने लगें है ।।


पूनमचंद गुप्‍ता (पट्टू)

7 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी वैचारिक विश्लेष्णात्मक ,मानवीय रिश्तों के महत्व और उसके व्यक्तिगत जीवन में महत्व को दर्शाती ,संदेशात्मक और प्रेरक कविता के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद / आशा है आप इसी तरह ब्लॉग की सार्थकता को बढ़ाने का काम आगे भी ,अपनी अच्छी सोच के साथ करते रहेंगे / ब्लॉग हम सब के सार्थक सोच और ईमानदारी भरे प्रयास से ही एक सशक्त सामानांतर मिडिया के रूप में स्थापित हो सकता है और इस देश को भ्रष्ट और लूटेरों से बचा सकता है /आशा है आप अपनी ओर से इसके लिए हर संभव प्रयास जरूर करेंगे /हम आपको अपने इस पोस्ट http://honestyprojectrealdemocracy.blogspot.com/2010/04/blog-post_16.html पर देश हित में १०० शब्दों में अपने बहुमूल्य विचार और सुझाव रखने के लिए आमंत्रित करते हैं / उम्दा विचारों को हमने सम्मानित करने की व्यवस्था भी कर रखा है / पिछले हफ्ते अजित गुप्ता जी उम्दा विचारों के लिए सम्मानित की गयी हैं /

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  2. बहु्त बढिया गुप्ता जी
    बहुत दिनो के बाद दिखे।
    अच्छी रचना

    राम राम

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